नई दिल्ली: भारत के उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने देश की अदालतों में लंबित हजारों जमानत याचिकाओं पर चिंता जताते हुए एक ऐतिहासिक दिशा-निर्देश जारी किया है। मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया है कि हाईकोर्टों में जमानत याचिकाओं का महीनों या सालों तक लंबित रहना व्यक्ति के ‘स्वतंत्रता के अधिकार’ (Right to Liberty) का उल्लंघन है। कोर्ट ने आदेश दिया कि अब हाईकोर्ट जमानत याचिकाओं पर सुनवाई तेज करने के लिए औपचारिक नोटिस जारी करने की प्रतीक्षा किए बिना फैसला ले सकते हैं, बशर्ते याचिका की कॉपी अभियोजन पक्ष (Prosecution) को पहले ही उपलब्ध करा दी गई हो।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करना न्यायपालिका का प्राथमिक कर्तव्य है और केवल प्रक्रियात्मक देरी के कारण किसी को जेल में रखना न्यायसंगत नहीं है। यह निर्णय विशेष रूप से उन ‘अंडर-ट्रायल’ कैदियों के लिए बड़ी उम्मीद बनकर आया है जो छोटे अपराधों के आरोप में लंबे समय से जेलों में बंद हैं और कानूनी पेचीदगियों के कारण उनकी सुनवाई नहीं हो पा रही है।
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यद्यपि मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस फैसले को ‘क्रांतिकारी’ बताया है, लेकिन कुछ कानूनी विशेषज्ञों ने इसके क्रियान्वयन में ‘प्रक्रियात्मक चूक’ (Procedural lapses) की आशंका जताई है। आलोचकों का तर्क है कि बिना औपचारिक नोटिस के सुनवाई करने से अभियोजन पक्ष को अपना पक्ष मजबूती से रखने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाएगा, जिससे न्याय की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। जांच एजेंसियों ने भी चिंता जताई है कि यदि जमानत प्रक्रिया बहुत अधिक उदार हो जाती है, तो गंभीर अपराधों के मामलों में गवाहों को प्रभावित करने या साक्ष्यों से छेड़छाड़ का खतरा बढ़ सकता है। कोर्ट के लिए अब मुख्य चुनौती इस आदेश को पारदर्शी तरीके से लागू करवाना है।
















