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उत्तराखंड सरकार ने पिरुल एकत्रीकरण के लिए प्रोत्साहन राशि बढ़ाई

जंगलों को आग से बचाने के लिए ग्रामीणों को अब मिलेंगे ₹15 प्रति किलो; 'वेस्ट टू वेल्थ' मॉडल पर जोर

देहरादून: उत्तराखंड के जंगलों में धधक रही आग (Forest Fire) को नियंत्रित करने के लिए राज्य सरकार ने एक बड़ा नीतिगत निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी( pushkar singh dhami) ने घोषणा की है कि ‘पिरुल’ (pine leaves) एकत्रित करने वाले ग्रामीणों और स्वयं सहायता समूहों को दी जाने वाली प्रोत्साहन राशि को ₹10 से बढ़ाकर ₹15 प्रति किलोग्राम कर दिया गया है। इस कदम का उद्देश्य वनाग्नि के मुख्य कारण ‘फ्यूल लोड’ को कम करना और स्थानीय लोगों के लिए स्वरोजगार के अवसर पैदा करना है।

सरकार ने उद्योग विभाग को निर्देश दिए हैं कि एकत्रित पिरुल को बायोमास प्लांट और ब्रिकेट निर्माण इकाइयों तक पहुँचाने के लिए परिवहन की उचित व्यवस्था की जाए। वर्तमान में राज्य में 5 बड़े पिरुल आधारित ऊर्जा संयंत्र काम कर रहे हैं, और सरकार की योजना आगामी वर्ष तक इनकी संख्या दोगुनी करने की है। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, इस प्रोत्साहन योजना के कारण पिछले एक सप्ताह में वनाग्नि की सक्रिय घटनाओं में 30% की कमी देखी गई है, क्योंकि ग्रामीण अब जंगलों से सूखी पत्तियां हटाने में अधिक रुचि ले रहे हैं।

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एक तरफ जहाँ प्रोत्साहन राशि बढ़ाने का स्वागत हो रहा है, वहीं विशेषज्ञों का तर्क है कि पिरुल एकत्रीकरण के लिए आवश्यक लॉजिस्टिक्स और भंडारण केंद्रों की कमी अभी भी एक बड़ी बाधा है। आलोचकों का मानना है कि केवल राशि बढ़ाना पर्याप्त नहीं है; सरकार को इन संयंत्रों की क्षमता बढ़ानी होगी ताकि एकत्रित पिरुल का समय पर निस्तारण हो सके। अन्यथा, गांवों के पास जमा पिरुल के ढेर खुद एक बड़ी अग्नि दुर्घटना का कारण बन सकते हैं।

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