पौड़ी गढ़वाल: उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग (Forest Fire) अब केवल पर्यावरण ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी बड़ा खतरा बन गई है। पौड़ी जिले के श्रीनगर और कीर्तिनगर क्षेत्रों में भीषण आग रिहायशी इलाकों तक पहुँच गई है। जिला अस्पताल पौड़ी की रिपोर्ट के अनुसार, वनाग्नि के धुएं के कारण आंखों में जलन, सूखेपन और सांस लेने में तकलीफ (Asthma/Bronchitis) के मरीजों की संख्या में पिछले एक सप्ताह में 30% का उछाल आया है। ओपीडी में प्रतिदिन 15 से 20 नए मरीज केवल धुएं से होने वाली एलर्जी की शिकायत लेकर पहुँच रहे हैं।
इस बीच, वनाग्नि के आंकड़ों को लेकर वन विभाग और स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच विवाद खड़ा हो गया है। जहाँ विभाग पौड़ी प्रभाग में मात्र 26 घटनाओं की बात कर रहा है, वहीं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सैटेलाइट डेटा और जमीनी सर्वेक्षण का हवाला देते हुए घटनाओं की संख्या कहीं अधिक बताई है। वन विभाग ने दावा किया है कि 1,300 से अधिक क्रू स्टेशनों के माध्यम से निगरानी की जा रही है और पिरुल (चीड़ की पत्तियां) हटाने के लिए 15,000 पेड़ों के आसपास की ‘फायर लाइन्स’ को साफ किया जा रहा है।
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पर्यावरणविदों ने वन विभाग की ‘आंकड़ा छिपाने’ की प्रवृत्ति की कड़ी आलोचना की है। उनका तर्क है कि जब तक समस्या की गंभीरता को स्वीकार नहीं किया जाएगा, तब तक संसाधन आवंटित नहीं होंगे। स्थानीय लोगों का कहना है कि वनाग्नि की घटनाएं अक्सर मानवीय लापरवाही से शुरू होती हैं, लेकिन विभाग का ध्यान केवल आग बुझाने (Reactive) पर रहता है, जबकि जन जागरूकता और ‘कंट्रोल बर्निंग’ (Preventive) पर बजट खर्च नहीं किया जा रहा है।
















